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आरक्षण एक कुप्रथा – अंकित चक्रवर्ती

लेखक अंकित चक्रवर्ती की आरक्षण पर एक कविता है….

आरक्षण उसे मिलता था जो होता इसके लायक था।
आरक्षण दिलवाने वाला अम्बेडकर जननायक था।
अब तो आरक्षण बस लूट रही नौकरियो की होड़ की
आरक्षण से मिल जाती है छूट डिग्रियों के दौड़ की
अब तो आरक्षण लूट कर अपने देश को ही खा गया
टॉप कर बैठा घर फेल सरकारी नौकरी पा गया
आरक्षण जब मान्य हुआ देश की परम्पराओ में
यह मिलना चाहिए था केवल अम्बेडकर के गाँव मे
जहां निम्न जातियों की मानी जाती नही जात थी
हलक में कुएं के पास जाकर सूख जाती प्यास थी
अब उसे मिल जाता है जो बैठा महलों की छाव में।
जाकर देखो कितने अपाहिज रहते मेरे गाँव मे
दलितों को आरक्षण देना अपने देश का विधान है।
मंत्री का बेटा आरक्षण पाता कैसा संविधान है
संविधान पर एक बहुत बड़ा प्रश्न खड़ा हो जाता है।
आरक्षण को लेकर जब देश को दंगा खा जाता है।
मैंने मैंने हां मैंने आरक्षण को पलते देखा है।
आरक्षण के कारण अपना देश सम्भलते देखा है।
आरक्षण के ऊपर नेता नगरी को लड़ते देखा है।
आरक्षण के कारण अपने देश को जलते देखा है।

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