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अमित’आनंद’ (उन्नाव) की कविता कुछ रोना, हंसना, गाना है….

कुछ ख्वाब अधूरे बुनने है , आंसू का कर्ज चुकाना है
कुछ यादों के पहरे है , कुछ रोना, हँसना, गाना है,,,,,

वो भरी महफिलों में भी जो एकाकी सा चेहरा है
आंखे उसकी भी खाली है जिसके सिर पर सेहरा है
हर कोई वेदना को पाले बेवजह यहां मुस्काता है
केवल कवि ही अपनी पीड़ा गीत बना कर गाता है।
जिसको चाहा दिल-ओ- जान से वो तो बस अफसाना है
कुछ यादों के पहरे है , कुछ रोना, हँसना, गाना है,,,,,,,,,,,,

जो दुल्हन सेज पर बैठी है वो मन भीतर से टूटी है
जो स्वप्न देखती बचपन से वह स्वप्न डगरिया छूटी है
हर कोई यहां दिल को थामे कठपुतली सा हो जाता है
होनी के सिर पर डाल बोझ मन कर्म विमुख हो जाता है
कर्म प्रधान बने मानव माया माया से मोह छुड़ाना है
कुछ यादों के पहरे है कुछ रोना, हँसना, गाना है,,,,,,,,,

सच्चाई पर अडिग रहे , छल से न तनिक भी भय खाये
गहरी कितनी हो रात भले , फिर सुबह सुनहरी ही आये
इस स्वर्णिम प्रभात के स्वागत में तैयार खड़े हो जाओ तुम
कर्म करो बस कर्म करो फल हित दौड़ न जाओ तुम
जो अपना है खुद आएगा बस यही महज बतलाना है
कुछ यादों के पहरे है कुछ रोना, हँसना, गाना है,,,,,,,,,,,

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